आईटीआई की सरकारी ग्रेडिंग नौकरी की गारंटी नहीं

सरकारी ग्रेड मिलने का मतलब नौकरी की गारंटी नहीं है। यह ग्रेड बताता है कि कोई संस्थान सरकार के तय मानकों पर कैसा प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद छात्रों का क्या होता है।

प्रशिक्षण महानिदेशालय (DGT) की 2026–27 की ग्रेडिंग प्रणाली में किसी आईटीआई के कुल अंकों का 30 प्रतिशत दाखिलों और 30 प्रतिशत परीक्षा में पास होने की दर पर आधारित है। बाकी 40 प्रतिशत अंक छह मानकों में बाँटे गए हैं। इनमें छात्राओं के दाखिले, अलग-अलग ट्रेडों की संख्या, कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं में भागीदारी और उनमें मिले अंक, उद्योगों से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम (डुअल सिस्टम ऑफ ट्रेनिंग) में दाखिले और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा दिव्यांग छात्रों के दाखिले शामिल हैं।

हैरानी की बात यह है कि इस ग्रेडिंग प्रणाली में यह देखा ही नहीं जाता कि प्रशिक्षण पूरा करने वाले कितने छात्रों को नौकरी मिली और उनकी कमाई कितनी है। उद्योगों से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम में दाखिले का मतलब भी यह नहीं है कि प्रशिक्षण के बाद नौकरी मिल गई। इससे सिर्फ यह पता चलता है कि कितने छात्रों ने ऐसे प्रशिक्षण में हिस्सा लिया।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान सरकार भिवाड़ी, अलवर, नीमराना, तिजारा और किशनगढ़ बास के पाँच सरकारी आईटीआई को बेहतर बनाने के लिए 241 करोड़ रुपये निवेश करने जा रही है। इनमें इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन और रोबोटिक्स जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना है।

नए पाठ्यक्रम और बेहतर उपकरण रोजगार के अवसर बढ़ा सकते हैं। लेकिन इनके फायदे का पता ठोस सबूतों से ही चलेगा। मौजूदा ग्रेडिंग प्रणाली यह नहीं बताती कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद छात्रों को नौकरी मिलती भी है या नहीं।

दाखिला लेने से पहले छात्रों को अपने भविष्य के बारे में साफ जानकारी मिलनी चाहिए। कितने छात्रों को वेतन वाली नौकरी या अप्रेंटिसशिप मिली? उनकी कमाई कितनी थी? और कितने लोग आगे भी रोजगार में बने रहे? सिर्फ नौकरी देने वाली कंपनियों के नाम गिना देना इन सवालों का जवाब नहीं है।

सरकारी ग्रेड से छात्र तय मानकों के आधार पर अलग-अलग संस्थानों की तुलना कर सकते हैं। लेकिन उनके लिए असली सवाल यह है कि क्या प्रशिक्षण से अच्छा रोजगार मिलेगा। अगर इस सवाल का जवाब संस्थान खुद नहीं देंगे, तो कौन देगा?