जी हां, आपने सही पढ़ा। सुनने में अजीब लगता है न? लेकिन पहली नौकरी की तलाश कर रहे भारत के लाखों युवाओं को हर दिन इसी विरोधाभास का सामना करना पड़ रहा है।
आंकड़े तो इससे भी दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। लगभग 1,100 नियोक्ताओं के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि उनमें से 75 प्रतिशत जुलाई से दिसंबर 2026 के बीच अपनी कंपनियों में फ्रेशर्स की भर्ती करने की योजना बना रहे थे। इस साल की पहली छमाही में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत था। फ्रेशर्स की मांग खास तौर पर रिटेल, टेक्नोलॉजी, ई-कॉमर्स स्टार्टअप और दिलचस्प बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी बढ़ रही है।
लेकिन दूसरी ओर, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के अनुसार, भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत थी। यह कुल कामकाजी आबादी की बेरोजगारी दर से काफी अधिक है।
तो आखिर हो क्या रहा है? दरअसल, कंपनियां अब फ्रेशर्स से सिर्फ डिग्री की अपेक्षा नहीं रखतीं। वे शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ इंटर्नशिप और वास्तविक प्रोजेक्ट पर काम करके हासिल किए गए व्यावहारिक कौशल को अधिक महत्व देने लगी हैं। नतीजा यह है कि उन फ्रेशर्स के बीच एक स्पष्ट अंतर पैदा हो रहा है, जिनके पास काम करने की व्यावहारिक क्षमता दिखाने के लिए कुछ है, और जिनके पास सिर्फ डिग्री है। ऐसा नहीं है कि कंपनियों ने फ्रेशर्स के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। लेकिन अब वे ऐसे फ्रेशर्स चाहती हैं, जिनके पास पहले से कुछ अनुभव हो। और इससे पहली नौकरी के मायने ही बदल रहे हैं।
जिस युवा ने इंटर्नशिप या अप्रेंटिसशिप की है, या किसी वास्तविक प्रोजेक्ट पर काम किया है, वह निस्संदेह नौकरी के लिए बेहतर तैयार होगा। आज के बेहद प्रतिस्पर्धी कारोबारी माहौल में कंपनियां अपने कर्मचारियों की व्यावहारिक क्षमता को अधिक महत्व दें, तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन पहले से अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को जरूरत से ज्यादा प्राथमिकता देने से एक दूसरा सवाल खड़ा होता है। आखिर किसी फ्रेशर से कितने अनुभव की उम्मीद की जा सकती है?
यह सही है कि इंटर्नशिप या अप्रेंटिसशिप कर चुके और वास्तविक प्रोजेक्ट पर काम कर चुके युवा कार्यस्थल की चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर तैयार हो सकते हैं। लेकिन अगर पहले का अनुभव एक अतिरिक्त योग्यता के बजाय नौकरी पाने की अनिवार्य शर्त बन जाए, तो इन युवाओं को वह अनुभव सबसे पहले देगा कौन?
कंपनियों को अनुभवी पेशेवरों की जरूरत जरूर है। लेकिन अनुभवी कर्मचारी तैयार भी तो यही कंपनियां करती हैं। आखिर हर अनुभवी कर्मचारी ने कभी न कभी अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। आज वह जो कुछ जानता है, उसमें से बहुत कुछ उसने काम करते हुए ही सीखा है। हर सीईओ और हर मैनेजर भी कभी एक ऐसा फ्रेशर था, जिसे काम का व्यावहारिक अनुभव नहीं था।
पहली नौकरी ही कर्मचारी को सिखाती है कि सहकर्मियों के साथ कैसे काम किया जाता है, उन मुश्किल परिस्थितियों का सामना कैसे किया जाता है जिनका जिक्र किताबों में नहीं मिलता, नाराज ग्राहकों को कैसे संभाला जाता है, गलतियों से कैसे सीखा जाता है और उन्हें सुधारकर आगे कैसे बढ़ा जाता है। समय पर काम पूरा करना और जिम्मेदारियां निभाना भी वह इसी दौरान सीखता है।
इसलिए भारत को सिर्फ अधिक नौकरियों की जरूरत नहीं है। उसे ऐसी कंपनियों की भी जरूरत है, जो जो प्रतिभाशाली फ्रेशर्स को मौका दें और उनकी क्षमताओं को निखारने में समय और संसाधन लगाएं। जो उन्हें काम करते हुए सीखने का अवसर दें और इतना समय और गुंजाइश भी, कि वे धीरे-धीरे अनुभवी और कुशल पेशेवर बन सकें। वरना भारत के लाखों नए स्नातकों के सामने वही अजीब सवाल खड़ा रहेगा। पहली नौकरी चाहिए? तो पहले बताइए, आपके पास अनुभव कितना है?

