ऑफिस की राजनीति: एक अनकही सच्चाई

ऑफिस में काम करने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो ‘ऑफिस पॉलिटिक्स’ से परिचित न हो। हर कोई उस कर्मचारी को जानता है जो बॉस का चहेता है और जिसे महत्वपूर्ण काम सौंपे जाते हैं। उस मीठी बातें करने वाले सहकर्मी को भी, जिसकी बड़े अधिकारियों तक सीधी पहुंच है। उस मीटिंग का अनुभव भी लगभग सभी को है, जिसमें हर कोई जानता है कि बॉस गलत है, लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। और वह कर्मचारी भी सबको याद होगा जिसे न जाने कैसे हर महत्वपूर्ण जानकारी दूसरों से पहले मिल जाती है।

प्रबंधन से जुड़े शोध में कर्मचारियों की इस धारणा के लिए एक शब्द है—’परसीव्ड ऑर्गेनाइजेशनल पॉलिटिक्स’ (Perceived Organisational Politics)। इसका मतलब है कर्मचारियों का यह मानना कि कंपनी में फैसले और पुरस्कार योग्यता के बजाय निजी स्वार्थ, आपसी संबंधों और अनौपचारिक प्रभाव से तय होते हैं।

भारत में हुए शोध बताते हैं कि कर्मचारियों की ऐसी धारणा कंपनियों को भारी पड़ सकती है। भारतीय मैनेजरों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन संगठनों में भाई-भतीजावाद, पक्षपात और अनुचित फैसले होने की धारणा थी, वहां कर्मचारियों का काम के प्रति जुड़ाव और नए प्रयोग करने की इच्छा प्रभावित हुई। साथ ही, उनमें नौकरी छोड़ने की इच्छा भी बढ़ी।

यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऑफिस की राजनीति कर्मचारियों के व्यवहार को बदल देती है।

2025 में IIMB Management Review में प्रकाशित एक अध्ययन में 450 से अधिक कामकाजी महिलाओं को शामिल किया गया था। इसमें पाया गया कि ऑफिस की राजनीति के कारण इन महिलाओं के कामकाजी अनुभव और मानसिक सुकून पर बुरा असर पड़ रहा था। इसके चलते वे अपनी बात खुलकर कहने से भी हिचकने लगी थीं।

किसी कंपनी के लिए यह महंगा साबित हो सकता है, क्योंकि कर्मचारी उसके साथ महत्वपूर्ण जानकारी साझा करना ही बंद कर सकते हैं।

भारत में आईटी, बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों के 450 से अधिक कर्मचारियों पर हुए एक अन्य सर्वेक्षण में भी पाया गया कि कार्यस्थल पर किसी को अलग-थलग करना या दूसरों से काटकर रखना कर्मचारियों की चुप्पी को बढ़ाता है। वे खुद को किसी परेशानी से बचाने के लिए बोलना बंद कर देते हैं। इसका उनकी रचनात्मकता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।

अब किसी कंपनी की कल्पना कीजिए। एक जूनियर कर्मचारी को काम में कोई समस्या दिखाई देती है, लेकिन वह अपने मैनेजर को नहीं बताता। किसी के पास एक शानदार विचार है, लेकिन वह उसे साझा नहीं करता, क्योंकि सब जानते हैं कि उसका श्रेय आखिर किसे मिलेगा। टीम किसी फैसले से सहमत नहीं है, लेकिन राय पूछे जाने पर सभी हामी भर देते हैं।

कंपनी का काम चलता रहता है। मीटिंग होती रहती हैं। ऊपर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। लेकिन भीतर एक महत्वपूर्ण बदलाव आ चुका होता है। कर्मचारियों से वरिष्ठ अधिकारियों तक उपयोगी जानकारी पहुंचनी बंद हो गई है।

यहीं ऑफिस की राजनीति उत्पादकता की समस्या बन जाती है। जब कर्मचारी महत्वपूर्ण जानकारी अपने तक रखने लगते हैं, तो फैसले लेने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है और कभी-कभी उसमें गंभीर रुकावट भी आ सकती है। इसकी कीमत आखिरकार कंपनी को चुकानी पड़ती है।

ऑफिस की राजनीति का एक और नुकसान हो सकता है। IIMB Management Review में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में भारतीय कंपनियों के 600 से अधिक कर्मचारियों को शामिल किया गया था। इसमें पाया गया कि जिन कर्मचारियों को अपने ऑफिस में राजनीति ज्यादा होने का एहसास था, उन्हें सबको साथ लेकर चलने वाली कार्यसंस्कृति का भी पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा था। इसका असर उनके मानसिक सुकून और काम के अनुभव पर पड़ रहा था।

इससे समझ आता है कि कंपनियों के लिए सिर्फ अच्छे सिद्धांतों और मूल्यों की घोषणा कर देना काफी नहीं है। कर्मचारी देखते हैं कि कंपनी वास्तव में कैसे चलती है।

कौन मैनेजरों का चहेता है? किसकी गलतियां बार-बार माफ कर दी जाती हैं? किसकी वरिष्ठ अधिकारियों से ज्यादा नजदीकी है? किसके विचारों को अधिक गंभीरता से लिया जाता है? किसकी बड़े अधिकारियों तक आसानी से पहुंच है? और कौन बिना किसी डर के बॉस से असहमति जता सकता है? ये बातें किसी संगठन की असलियत उसके घोषित मूल्यों से कहीं अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाती हैं।

बेशक, किसी भी कार्यस्थल से राजनीति पूरी तरह खत्म होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। आखिर संगठन भी इंसानों से ही बनते हैं। अवसर सीमित होते हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा होती है और लोग अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं। किसी संगठन में प्रभावी ढंग से काम करने के लिए आपसी संबंधों और अनौपचारिक समीकरणों को समझना भी जरूरी है।

समस्या तब शुरू होती है जब कर्मचारियों को लगने लगता है कि अच्छा प्रदर्शन करने से ज्यादा महत्वपूर्ण बॉस के करीब होना है। एक बार यह धारणा बन जाए, तो कर्मचारी अपनी कार्यकुशलता सुधारने के बजाय सही लोगों से संबंध बनाने पर ध्यान देने लग सकते हैं। वे महत्वपूर्ण जानकारी छिपा सकते हैं और गलतियां देखकर भी चुप रहना बेहतर समझ सकते हैं।

और जब ऐसा व्यवहार पूरे संगठन में फैलने लगे, तो उसके परिणाम क्या होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।