क्या बेहतरीन कर्मचारी एक बेहतरीन मैनेजर भी बन सकता है?

तीन स्थितियों की कल्पना कीजिए। एक सेल्स एग्जीक्यूटिव है, जो न सिर्फ अपना लक्ष्य पूरा करती है, बल्कि लगातार उससे बेहतर प्रदर्शन करती है। एक इंजीनियर है, जो ऐसी तकनीकी समस्याएं सुलझा देता है जिनका हल ढूंढते-ढूंढते बाकी लोग परेशान हो जाते हैं। और एक प्रोडक्शन सुपरवाइजर है, जिसे अपने काम में इतनी महारत हासिल है कि वह पूरी उत्पादन प्रक्रिया की हर बारीकी जानता है।

अब मान लीजिए कि इनके विभागों में मैनेजर का एक पद खाली होता है। पदोन्नति किसे मिलेगी? ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले कर्मचारी को। सुनने में यह बिल्कुल तर्कसंगत लगता है। अक्सर होता भी यही है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि यह एक बड़ी गलती भी साबित हो सकती है?

दुनिया भर में कई कंपनियां अनजाने में इसी गलती को दोहराती हैं। वे अपने सबसे अच्छे कर्मचारियों को मैनेजर बना देती हैं। और कई बार स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ने लगती है।

वजह सीधी है। हमारे उदाहरण में सेल्स एग्जीक्यूटिव बिक्री करने में माहिर थी। लेकिन अब उसे दूसरों को सिखाना है कि ग्राहक से सौदा कैसे तय किया जाए। क्या वह एक अच्छी प्रशिक्षक भी साबित होगी? इंजीनियर तकनीकी समस्याएं आसानी से सुलझा लेता था। लेकिन पदोन्नति के बाद उसे दो नए इंजीनियरों के बीच पैदा हुआ विवाद सुलझाना है। क्या वह यह काम भी उतनी ही कुशलता से कर पाएगा? जरूरी नहीं।

मैनेजमेंट का असली काम दूसरों से बेहतर नतीजे हासिल करवाना है। लेकिन अपने काम में असाधारण प्रदर्शन करने वाला कर्मचारी जरूरी नहीं कि दूसरों को भी उतना ही कुशल बना सके।

भारत के प्रबंधन संस्थान भी इस बदलाव की चुनौती को पहचानते हैं। भारतीय प्रबंध संस्थान, इंदौर (IIM Indore) में पहली बार मैनेजर बनने वाले कर्मचारियों के लिए आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के विवरण में कहा गया है कि कर्मचारी से मैनेजर बनने पर आवश्यक कौशल, समय के उपयोग और काम से जुड़े मूल्यों में बदलाव आता है।

नए मैनेजर से अब यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी व्यक्तिगत दक्षता के बल पर नतीजे हासिल करने के बजाय दूसरे कर्मचारियों के माध्यम से वही नतीजे हासिल करे। इसके लिए बिल्कुल अलग तरह के कौशल चाहिए। फैसले लेने की क्षमता, कार्यस्थल पर भावनाओं को समझना और संभालना, विवाद सुलझाना, टीम विकसित करना और कर्मचारियों को मार्गदर्शन देना। लेकिन जरूरी नहीं कि पदोन्नति देते समय किसी बेहतरीन कर्मचारी की इन क्षमताओं को परखा गया हो।

शायद कंपनियों के ऐसा करते रहने की एक वजह भी है। मैनेजर बनना संगठन में एक पायदान ऊपर चढ़ने जैसा माना जाता है। बहुत से कर्मचारी इसी की आकांक्षा रखते हैं। अधिक जिम्मेदारी, ऊंचा पद, बढ़ी हुई तनख्वाह और शायद अपना अलग केबिन भी। ये सब तरक्की की निशानी माने जाते हैं। लेकिन इसी सोच से एक अनोखी समस्या पैदा होती है।

उस इंजीनियर, सेल्सपर्सन, शोधकर्ता या तकनीकी विशेषज्ञ को कैसे पुरस्कृत किया जाए, जो अपने काम में असाधारण है, लेकिन जिसके पास प्रबंधन की आवश्यक क्षमताएं नहीं हैं? पदोन्नति का एकमात्र सार्थक रास्ता मैनेजर बनना ही दिखाई देता है। इसलिए कंपनियां अपने प्रतिभाशाली विशेषज्ञों को प्रबंधकीय पद देकर पुरस्कृत करती हैं, भले ही वे उस भूमिका के लिए उपयुक्त न हों।

कंपनियों को इस तरीके पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। उन्हें खुद से कुछ सवाल पूछने चाहिए।

क्या पदोन्नति का मतलब किसी बेहतरीन विशेषज्ञ पर ऐसी जिम्मेदारी डाल देना है, जिसे निभाने में वह शायद उतना कुशल न हो? क्या मैनेजर का पद पिछले काम में अच्छे प्रदर्शन के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार होना चाहिए? या मैनेजमेंट को एक अलग भूमिका माना जाना चाहिए, जिसके लिए अलग कौशल जरूरी हैं? और जो पेशेवर अपने काम में महारत रखते हैं, उन्हें मैनेजर बनाए बिना उनकी प्रतिभा का सम्मान और पुरस्कार देने के दूसरे रास्ते क्या हो सकते हैं?

इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने से शायद कई बेहतरीन कर्मचारियों को खराब मैनेजर बनने से बचाया जा सके। और इसके साथ ही आगे चलकर पैदा होने वाली निराशा, असंतोष और आपसी कड़वाहट से भी बचा जा सके।