भारत में रोजगार के ताजा आंकड़ों से कुछ दिलचस्प बातें सामने आई हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के अनुसार, देश में स्वरोजगार करने वालों की हिस्सेदारी 2024 के 57.5 प्रतिशत से घटकर 2025 में 56.2 प्रतिशत रह गई। वहीं, नियमित वेतन या तनख्वाह पाने वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी 22.4 प्रतिशत से बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गई।
ये आंकड़े बाजार में एक बदलाव का संकेत जरूर देते हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है। जो रोजगार बढ़ रहा है, उसकी गुणवत्ता कैसी है?
आखिर नौकरी का मतलब सिर्फ काम मिल जाना नहीं है। उससे कहीं अधिक है। नौकरी से मिलने वाली आय, आर्थिक सुरक्षा, अन्य सुविधाएं, काम करने का माहौल, काम में लगने वाला समय और सबसे बढ़कर, एक बेहतर और सम्मानजनक जिंदगी जीने की संभावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
इस नजरिए से देखें तो भारत में रोजगार की तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वयस्क कामगारों की तुलना में युवा भारतीय कामगारों के असंगठित रोजगार या असुरक्षित आजीविका वाले कामों में लगे होने की संभावना अधिक थी। इतना ही नहीं, रोजगार की विभिन्न श्रेणियों में उनकी कमाई भी वयस्क कामगारों से कम थी।
जिस देश का आर्थिक भविष्य काफी हद तक उसकी युवा आबादी पर निर्भर करता है, उसके लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय होनी चाहिए।
इस असमानता को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक कर्मचारी के पास स्थायी नौकरी है, उससे जुड़ी सुविधाएं हैं और आगे चलकर पदोन्नति की संभावना भी है। वहीं, दूसरे के पास न कोई लिखित अनुबंध है, न नौकरी की सुरक्षा और न ही इस बात का भरोसा कि कल भी उसका काम बना रहेगा। लेकिन विडंबना यह है कि रोजगार के आंकड़ों में दोनों को ही ‘रोजगार प्राप्त’ माना जाता है।
स्वरोजगार के आंकड़े भी इस तस्वीर का एक और पहलू सामने लाते हैं। भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अनुसार, कुल रोजगार प्राप्त लोगों में 40.5 प्रतिशत अपने स्तर पर काम करने वाले या नियोक्ता थे, जबकि 15.6 प्रतिशत अपने परिवार के उद्यमों में सहायक के रूप में काम कर रहे थे।
लेकिन 40.5 प्रतिशत वाली श्रेणी में रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे कारीगर और अपने दम पर सेवाएं देने वाले ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके यहां कोई कर्मचारी नहीं है।
कमाई के आंकड़े भी रोजगार की गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।
PLFS 2025 के अनुसार, नियमित वेतन पाने वाले पुरुष कर्मचारियों की औसत मासिक कमाई 24,217 रुपये और महिला कर्मचारियों की 18,353 रुपये थी। वहीं, स्वरोजगार करने वाले पुरुषों की औसत मासिक कमाई 17,914 रुपये और महिलाओं की महज 6,374 रुपये थी।
इसलिए भारत में रोजगार के आंकड़े भले ही उत्साहजनक लगें, लेकिन कुछ बुनियादी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
क्या इन नौकरियों से आर्थिक सुरक्षा मिलती है? क्या इनमें सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियां उपलब्ध हैं? क्या इनमें आगे बढ़ने के अवसर हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इनसे कामगार अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर जिंदगी बना सकता है?
इसमें कोई संदेह नहीं कि रोजगार की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत को अभी करोड़ों नए रोजगार पैदा करने होंगे। लेकिन सिर्फ रोजगार बढ़ाना ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता।
असली लक्ष्य ऐसे रोजगार पैदा करना होना चाहिए, जो कामगार को सिर्फ गुजारा करने का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, सम्मान और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर भी दें।

