समस्या जेन ज़ी में नहीं है

हाल ही में 1,000 से अधिक युवा भारतीयों पर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि जेन ज़ी के लगभग हर चार में से तीन पेशेवरों के लिए नेतृत्व का औपचारिक पद हासिल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन है। यह नतीजा कंपनियों में जेन ज़ी को लेकर बनी आम धारणा के बिल्कुल अनुरूप लगता है। जेन ज़ी जिम्मेदारी लेने से बचती है। उसमें महत्वाकांक्षा नहीं है। उसे काम में लचीलापन तो चाहिए, लेकिन उसके लिए कोई त्याग नहीं करना चाहती। ऐसी बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं।

लेकिन दूसरे शोध इन धारणाओं को गलत साबित करते हैं। जेन ज़ी और मिलेनियल्स पर 2026 में किए गए एक सर्वेक्षण में जेन ज़ी के 96 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने वरिष्ठ नेतृत्व के पदों में गहरी दिलचस्पी दिखाई। वहीं, 89 प्रतिशत प्रबंधन या सुपरवाइजर की भूमिका निभाने के इच्छुक थे। लेकिन इससे भी दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ 9 प्रतिशत ने नेतृत्व के पद तक पहुंचने को अपने करियर का मुख्य लक्ष्य बताया।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। युवा भारतीय यह नहीं कह रहे कि उन्हें नेतृत्व के पद नहीं चाहिए। वे सिर्फ इतना कह रहे हैं कि जीवन में उनकी दूसरी प्राथमिकताओं की कीमत पर ऐसा पद हासिल करना जरूरी नहीं है। कंपनियों को इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है।

दुनिया भर में मैनेजरों के अपने काम के प्रति जुड़ाव में आई भारी गिरावट भी कंपनियों के लिए गंभीर चिंता का विषय होनी चाहिए। यह आंकड़ा 2022 के 31 प्रतिशत से घटकर 2025 में 22 प्रतिशत रह गया। यह गिरावट दक्षिण एशिया में विशेष रूप से तेज रही, जिसके आंकड़ों में भारत की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इस क्षेत्र में मैनेजरों का अनुपात भी घटा है।

यानी प्रबंधन की जिम्मेदारियां तो बनी हुई हैं, लेकिन उन्हें निभाने वाले मैनेजरों की संख्या कम हो रही है। युवा कर्मचारी भी देख रहे हैं कि उनके मैनेजरों को किस तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है। बड़ी टीमों को संभालना, बढ़ते लक्ष्य पूरे करना, कर्मचारियों से लगातार मुश्किल बातचीत करना और वरिष्ठ अधिकारियों का बढ़ता दबाव झेलना। इसके अलावा, कर्मचारियों को अपने काम से जोड़े रखने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। ऐसे में अगर युवा यह सोचने लगें कि मैनेजर बनने पर मिलने वाले फायदे क्या सचमुच इतनी बड़ी कीमत चुकाने लायक हैं, तो इसमें हैरानी की क्या बात है?

कंपनियों में अक्सर यह शिकायत भी सुनाई देती है कि नई पीढ़ी अपने करियर में आगे बढ़ने को लेकर गंभीर नहीं है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही बताते हैं।

भारत में डेलॉयट के 2025 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जेन ज़ी के 94 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि काम करते हुए सीखना और व्यावहारिक अनुभव हासिल करना करियर में आगे बढ़ने में मदद करता है। वहीं, 85 प्रतिशत ने बताया कि वे हर सप्ताह कुछ न कुछ नया सीखने की गतिविधियों में भाग लेते हैं। हालांकि, 62 प्रतिशत का मानना था कि मैनेजरों को उन्हें मार्गदर्शन और सहयोग देना चाहिए, जबकि सिर्फ 44 प्रतिशत को लगा कि उन्हें वास्तव में ऐसा सहयोग मिल रहा है।

ये जवाब ऐसे कर्मचारियों के तो बिल्कुल नहीं लगते जिन्हें अपने करियर में आगे बढ़ने की कोई दिलचस्पी न हो। दरअसल, इस पीढ़ी के लिए तरक्की के मायने कुछ अलग हैं।

शोध के अनुसार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और काम तथा निजी जिंदगी के बीच संतुलन जेन ज़ी की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इसके अलावा नौकरी की सुरक्षा, अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना और लगातार नई चीजें सीखना भी उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है।

परंपरागत रूप से कंपनियों में सफलता का मतलब होता था वर्षों की मेहनत के बाद पदोन्नति पाना, संगठन में ऊंचे पद तक पहुंचना और दूसरे कर्मचारियों का प्रबंधन करना। लेकिन जेन ज़ी पहले यह जानना चाहती है कि उस ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद उसे किस चीज़ का सामना करना पड़ेगा।

जो कंपनियां अब तक पद और पदोन्नति का आकर्षण दिखाकर कर्मचारियों को प्रेरित करती रही हैं, उनके लिए यह सवाल असहज हो सकता है। लेकिन ऐसे सवाल उठाना आलस्य की निशानी नहीं है। इसके उलट, यह शायद सबसे समझदारी भरा सवाल है। आखिर अगर कंपनियां मैनेजर के पद का आकर्षण दिखाकर युवाओं को लुभाना चाहती हैं, तो युवा भी पूछ सकते हैं कि क्या उस पद तक पहुंचना वाकई इतनी मेहनत और त्याग के लायक है?

और जेन ज़ी के बारे में जल्दबाजी में कोई राय बनाने से पहले कंपनियों को खुद से भी यही सवाल पूछना चाहिए। क्या कंपनियां अपने मैनेजरों को काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन बनाने का अवसर दे रही हैं? क्या उनका काम का बोझ वाजिब है? क्या उन्हें फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता, जरूरी प्रशिक्षण और सहयोग मिल रहा है? क्योंकि जेन ज़ी यह सब देख रही है।

ऐसा नहीं है कि उसे करियर में दिलचस्पी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि उसमें पेशेवर रवैये की कमी है। वह सिर्फ अपने काम और जिम्मेदारियों के बदले बेहतर अवसर और परिस्थितियां चाहती है।